खुला है दर रफाकत का इनायत हो तो आ जाना,
किसी टूटे हुऐ दिल की जरूरत हो तो आ जाना।
हमे तेरी मुहब्बत का नशा सा अब हुआ जाता,
छिपी दिल मे तुम्हारी गर शराफत हो तो आ जाना।
हमारी चाह है तुमसे,कहे हर बात अब दिल की,
मेरी बातों से अब यारा तू सहमत हो तो आ जाना।
मिला है साथ जब तुमसे,नसीबा आज है चमका,
सजा कौना मेरे दिल का,कि उल्फत हो तो आ जाना।
सताते हैं जमाने मे गरीबो को अजी अकसर,
मजा लेते गरीबी का,की खिदमत हो तो आ जाना।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़