मनोरंजन

“गीत”- जी के पिपिल

घटा ने नभ में ली अंगड़ाई

धरा पर बहने लगी पुरवाई

दिल भी देने लगा दुहाई

कहीं से आ जाओ

जहां हो आ जाओ …..

 

रंग और गुलाल बुलाते

व्यंजनों के थाल बुलाते

ज़िद्दी हैं हर हाल बुलाते

ताक रही हैं राह तुम्हारी

घर की बनी मिठाई

कहीं से आ जाओ..…

 

हुलियारे सब पूछ रहे हैं

गलियारे सब पूछ रहे हैं

घर द्वारे सब पूछ रहे हैं

और लघु होती जाती हैं

यादों की परछाईं

कहीं से आ जाओ….

 

सब तो है पर कमी तुम्हारी

बसी आंख में नमी तुम्हारी

ज़िंदगी लगती थमी हमारी

सांस लगी है घुटने अपनी

बनकर आओ दवाई

कहीं से आ जाओ…..

 

अब अपनी पहचान एक हो

एक जमीं आसमान एक हो

इज्ज़त भी अपमान एक हो

होली के रंगों में छुपकर

ढूंढ लें फ़िर तरूणाई

कहीं से आ जाओ….

– जी के पिपिल, देहरादून, उत्तराखंड

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