घटा ने नभ में ली अंगड़ाई
धरा पर बहने लगी पुरवाई
दिल भी देने लगा दुहाई
कहीं से आ जाओ
जहां हो आ जाओ …..
रंग और गुलाल बुलाते
व्यंजनों के थाल बुलाते
ज़िद्दी हैं हर हाल बुलाते
ताक रही हैं राह तुम्हारी
घर की बनी मिठाई
कहीं से आ जाओ..…
हुलियारे सब पूछ रहे हैं
गलियारे सब पूछ रहे हैं
घर द्वारे सब पूछ रहे हैं
और लघु होती जाती हैं
यादों की परछाईं
कहीं से आ जाओ….
सब तो है पर कमी तुम्हारी
बसी आंख में नमी तुम्हारी
ज़िंदगी लगती थमी हमारी
सांस लगी है घुटने अपनी
बनकर आओ दवाई
कहीं से आ जाओ…..
अब अपनी पहचान एक हो
एक जमीं आसमान एक हो
इज्ज़त भी अपमान एक हो
होली के रंगों में छुपकर
ढूंढ लें फ़िर तरूणाई
कहीं से आ जाओ….
– जी के पिपिल, देहरादून, उत्तराखंड