मनोरंजन

ग़ज़ल – ऋतु गुलाटी

हिल रहे थे अस्थि पंजर एक जैसे हो गये।

पा  गये  वो देव  मंजर  एक जैसे हो गये।

 

आज  देखा लड़ रहे दोनो धनी बनने के लिये।

लूट  कर   दोनो ही बंजर  एक जैसे हो गये।

 

डूब कर नफरत में पागल आज दोनो हो लिये।

काटने  को  तेज  खंजर एक  जैसे हो गये।।

 

खिलती थी आरजू भी संग रहकर आज तो।

हो  गये  बीमार  पिंजर  एक  जैसे  हो गये।

 

दर्द सहना ऋतु पढे ना अब तो जुदाई का कभी।

दूर.. होकर  यार  पंजर  एक  जैसे  हो गये।

– रीतू गुलाटी  ऋतंभरा,  चंडीगढ़

Related posts

“अनसुलझी उलझन की बातें” पुस्तक लोकार्पण समारोह सफलतापूर्वक संपन्न

newsadmin

आखिर क्यों नहीं थम रहा रुपये में गिरावट का सिलसिला – डॉ सत्यवान सौरभ

newsadmin

दोहे – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

newsadmin

Leave a Comment