मनोरंजन

मेरी कलम से – डॉ क्षमा कौशिक

समय नहीं थमता है, पल-पल बढ़ता जाता है।
प्रतिदिन सूरज उगता, शाम ढले छिप जाता है।।
इस जीवन का सत्य हमें, नित ही समझाता है।
नहीं इसे जो समझे, यह उसको समझाता है।।
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प्रेम का है पंथ टेढ़ा,सूरमा ही चल सके।
राग के गहरे सुतल में, प्रेम मोती पल सके।
छोड़ कर माया जगत की, प्रेम में जो खो गया।
जगत की बंजर धरा में, प्रेम अंकुर बो गया।।
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड

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