यह अंतस क्यों द्रवित हुआ है,
क्यों सुलग रही हृदय की ज्वाला?
क्या अमित सनेह की भूल यही,
जो मिला न्याय का विष-प्याला?
जिसको माना सर्वस्व यहाँ,
क्यों उसने यह अन्याय किया,
विश्वास की पावन वेदी पर,
क्यों छल का गहरा घाव दिया?
अब और न विष की धार मिले,
किसी विरहणी मीरा को,
न नयन बहाएँ नीर कभी,
सहकर अंतस की पीड़ा को।
शकुनि सा कपटी छल करके,
कोई हँसे न जग के आँगन में,
मलते रह जाएँ हाथ यहाँ,
ऐसा न हो कभी किसी जीवन में।
हे माधव! हे अंतरयामी!
बस इतनी सी फ़रियाद सुनो,
विश्वास न टूटे भक्तों का,
ऐसा पावन संसार बुनो।
जो टीस भरी मेरे दिल में,
जो दर्द मिला इस जीवन से,
वह घाव न पाए कोई और,
यह विनती है इस अंतर्मन से।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर