मनोरंजन

ग़ज़ल – नित्यानंद वाजपेई

बेवफ़ा से दिल लगा कर क्या मिला,
ख़ुद पे इतना ज़ुल्म ढा कर क्या मिला।

ग़ैर की महफ़िल सजा कर क्या मिला,
अपनों को ठोकर में ला कर क्या मिला।

तोड़ ही देगी मोहब्बत रूह को,
तुमको इसमें दिल जला कर क्या मिला।

फेसबुक के इश्क़ का यह हश्र है,
लिंक्डइन इंस्टा पे आ कर क्या मिला।

मौज मस्ती के लिए शायर बना
राज़ सब दिल का सुना कर क्या मिला

दर्द मुफ़लिस का जो गाता बात थी,
इश्क़िया शायर कहा कर क्या मिला।

रात भर जागे रहे ऐतबार में,
ख़्वाबों की दुनिया में जा कर क्या मिला।

चार दिन की है हवा-ए-जिंदगी,
दुश्मनी सबसे बढ़ा कर क्या मिला।

सब समझते हैं यहाँ मकर-ओ-फ़रेब,
ख़ुद को यूं चोला ओढ़ा कर क्या मिला।

झूठी शोहरत के लिए यूं दर- ब- दर,
स्वाभिमान अपना गँवा कर क्या मिला।

आँसुओं को पी न जाती ख़ामुशी
ज़ख़्म दुनिया को दिखा कर क्या मिला।

वक़्त जब तक था तो दुत्कारा बहुत
बाद में सर पे बिठा कर क्या मिला।

नित्य माल-ओ-जर की खातिर इस क़दर,
ख़ुद को मिट्टी में मिला कर क्या मिला
– नित्यानंद वाजपेयी “उपमन्यु”
गीता विहार कॉलोनी, पांचाल घाट, गंगाधाम
फतेहगढ़ फर्रूखाबाद (उत्तर प्रदेश)- 209601

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