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मैं अग्नि परीक्षा दे दूँगी – नीलांजना गुप्ता

मैं अग्नि परीक्षा दे दूँगी,

तुम दीपक बन कर दिखलाओ

तलवार की धार पर चल लूँगी

पहले तुम योद्धा बन जाओ।

करते हो अपेक्षा मुझसे तुम

मैं भी आशा रख सकती हूँ

तुम रक्त का कण करो दान

प्राण की आहुति मैं दे सकती हूँ

मैं सृष्टि विजय कर लूँगी,

तुम संग्राम जीत कर दिखलाओ

रेगिस्तानी मैदानों में,

फूलों को महका सकती हूँ

मुझमें है इतनी शक्ति

मौत को जीवन मैं दे सकती हूँ

मैं अमृतमय हो जाऊँगी

तुम केवल औषधि बन जाओ

मुझको समझा केवल अबला

धोखा देगा यह अहंकार

दामन में दोष लगाते हो

देखो अंतस्तल में विचार

मैं देवी रूप हो जाऊँगी

तुम केवल मानव बन जाओ

काँटो की राह पर चल लूँगी

तूफानों से टकरा लूँगी

चट्टानों को मैं काट

मृदुल झरनों की धार बहा दूँगी

विष का प्याला पी जाऊँगी

तुम गम को पीकर दिखलाओ

मैं तेज पुञ्ज हूँ सूरज सी

तुम खुद उलूक बन बैठे हो

मेरा स्वरूप पहचानने को

तुम पहले दिव्य नयन लाओ।

– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

 

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