मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

हाले-दिल अब ठीक-ठाक है,

मेरी नज़र आज भी पाक है।

 

उम्र भर रहा बे- गुनाह मगर,

दिल है जख्मी गिरेबां चाक है।

 

रहे मुफलिसी से वाबस्ता सदा,

और उनकी ज़माने में धाक है।

 

सदा रहा खामोश सामने उनके,

मगर वो तो बड़े ही बे-बाक है।

 

तर्ज़े-क़त्ल बड़ा ही रूहानी उनका,

तीरे-नज़र से मासूम दिल जाक है।

 

जो बनते थे सरकार-ए-आलम,

हुए खाकसार वो बाकि ख़ाक हैं।

 

रब ख्वाहिशे-निराश पे लगाम दे,

आजकल फ़िज़ा मेरे खिलाफ हैं।

– विनोद निराश, देहरादून

 

हाले-जिस्म – शरीर का स्थिति

पाक – पवित्र / शुद्ध

गिरेबां चाक – पागलपन / गहरे सदमे में / कॉलर फटा हुआ

मुफलिसी – गरीबी

वाबस्ता – संबंध / जुड़ा हुआ / सम्बद्ध

धाक – शोहरत / ख्याति / दबदबा

बे-बाक – खुलकर (निडर) बोलने वाला

तर्ज़े-क़त्ल – वध का तरीका / हत्या का ढंग

रूहानी – आत्मिक / दिल से / अंतःकरण संबंधी

तीरे-नज़र – नज़र का तीर / तीखे नयन

जाक – अत्यंत दुखदाई / अधिक कष्ट देने वाला / हृदयद्रावी

सरकार-ए-आलम – दुनिया के मालिक / खुद को सब कुछ समझने वाला

खाकसार – मिट्टी के सामान / तुच्छ

ख़ाक – धुल / राख / मिट्टी

ख्वाहिशे-निराश – निराश की इच्छा (चाह / अभिलाषा)

फ़िज़ा – माहौल / हवा / वातावरण

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