neerajtimes.com – भागलपुर को केवल गंगा, रेशम और विक्रमशिला से जानना अधूरा है। शहर से कुछ दूर नाथनगर का चंपापुर उस प्राचीन स्मृति का द्वार खोलता है, जहां जैन परंपरा के बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की जीवनगाथा जीवित है। चंपापुर को उनकी पंचकल्याणक (गर्भ,जन्म,तप, केवलज्ञान और मोक्ष) भूमि माना जाता है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक मनाया जाता है। इस अवसर पर निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। यह अनुष्ठान जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण वह दर्शन है जिसके केंद्र में कर्मबंधन से मुक्ति और आत्मा की शुद्धि अर्थात मोक्ष है।
अंग जनपद प्राचीन भारत का महत्वपूर्ण जनपद था। चंपा उसकी प्रमुख नगरी थी। वर्तमान भागलपुर और आसपास का क्षेत्र इसी स्मृति को समेटे हुए है। व्यापार, संस्कृति और धर्म के साथ श्रमण परंपरा के विकास में भी इस भूभाग की बड़ी भूमिका रही।
बिहार का नाम ही जैन श्रमणों के विहार से जुड़ा है। यह वह भूभाग है जहां तीर्थंकरों और साधुओं का विहार हुआ, चातुर्मास हुए और श्रमण दर्शन की धाराएं विकसित हुईं। जैन परंपरा के अनुसार चौबीस में से छह तीर्थंकरों का जन्म बिहार में हुआ और अनेक की निर्वाण स्थली भी यहीं है। इसी भूगोल में अंग और चंपापुर का स्थान समझना चाहिए।
भगवान वासुपूज्य चौबीस तीर्थंकरों में बारहवें हैं। ‘वासुपूज्य’ का अर्थ है-जिनकी पूजा इंद्र भी करें। उनका जीवन संयम, वैराग्य और आत्मविजय का प्रतीक है।
जैन दर्शन कहता है कि जीव अपने शुद्ध रूप में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख का अधिकारी है, पर कर्मों का आवरण उसे दूर रखता है। कर्मों के क्षय पर जीव अपने शुद्ध रूप को पाता है, यही मोक्ष है। इसलिए मोक्ष मृत्यु का पर्याय नहीं, कर्मों से पूर्ण मुक्ति है। मोक्ष कल्याणक इसी मुक्ति का स्मरण है।
परंपरा के अनुसार वासुपूज्य ने युवावस्था में संसार की असारता समझी, विवाह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और संयम का मार्ग चुना। दीक्षा के बाद साधना से उन्हें केवलज्ञान और मोक्ष प्राप्त हुआ।
उनका जीवन आज के उपभोग-केंद्रित समाज के सामने सवाल रखता है कि क्या जीवन का अर्थ केवल अधिक पाना है? जैन दर्शन का उत्तर है-नहीं। अधिक संग्रह मुक्त नहीं करता। अपरिग्रह भीतर लौटने की राह दिखाता है, अहिंसा दूसरे के जीवन के प्रति संवेदनशील बनाती है और संयम इच्छाओं पर नियंत्रण सिखाता है।
चंपापुर की विशिष्टता यही है कि पांचों कल्याणक इसी से जोड़े जाते हैं। इसलिए इसे पंचकल्याणक क्षेत्र कहा जाता है। भागलपुर जिला प्रशासन भी चंपापुर दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र को गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान और मोक्ष से जुड़ा मानता है।
भागलपुर से करीब 48 किमी दूर बौंसी का मंदार जैन और हिंदू दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण है। जैन परंपरा में इसे दीक्षा, केवलज्ञान या निर्वाण से जोड़ा जाता है। विवरणों में अंतर है, इसलिए इन्हें धार्मिक परंपरा के संदर्भ में देखना उचित है। जिला प्रशासन भी मंदार को निर्वाण से संबंधित स्थल के रूप में दर्ज करता है। चंपापुर और मंदार को साथ देखने पर अंग के धार्मिक-सांस्कृतिक भूगोल की बड़ी तस्वीर बनती है। नाथनगर स्थित चंपापुर का वर्तमान मंदिर परिसर इस विरासत का जीवित प्रमाण है। यहां भगवान वासुपूज्य सहित अनेक तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं और देशभर से श्रद्धालु आते हैं।
चंपापुर की प्राचीनता, प्रतिमाओं, शिलालेखों और स्थापत्य को लेकर कई मान्यताएं हैं। इनका वैज्ञानिक पुरातात्विक परीक्षण और दस्तावेजीकरण जरूरी है। आस्था को प्रमाण से डरने की जरूरत नहीं। प्रामाणिक शोध से तीर्थ की प्रतिष्ठा और बढ़ती है। कौन-सी प्रतिमा किस काल की है, कौन-सा शिलालेख कब का है, मंदिर में क्या प्राचीन है और क्या बाद का निर्माण,इन पर शोध से चंपापुर को नई विश्वसनीयता मिलेगी। इतिहास और आस्था में संघर्ष जरूरी नहीं। आस्था तीर्थ को जीवित रखती है, इतिहास स्मृति को समझता है और पुरातत्व प्रमाणों की जांच करता है।
अंग का महत्व वासुपूज्य तक सीमित नहीं है, महावीर की यात्राओं और चंपा में उनके प्रवास की स्मृतियां, चंदनबाला की कथा भी इसी भूभाग की जैन स्मृति का हिस्सा है। यह अंग को श्रमण परंपरा के विस्तार का महत्वपूर्ण क्षेत्र सिद्ध करता है इसलिए भागलपुर की पहचान बहुस्तरीय है। विक्रमशिला बौद्ध परंपरा का बड़ा केंद्र है तो चंपापुर जैन परंपरा की महत्वपूर्ण स्मृति।
मोक्ष कल्याणक इस विरासत को फिर देखने का अवसर है। 25 सितंबर को चंपापुर में जब निर्वाण की स्मृति में आयोजन होगा, तब यह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं होगा। यह याद दिलाएगा कि सबसे बड़ी विजय बाहर पर अधिकार नहीं, भीतर के विकारों पर विजय है।
आज यह संदेश और जरूरी है। हिंसा केवल हथियार से नहीं होती। भाषा में, व्यवहार में, प्रकृति के प्रति रवैये में भी होती है। अपरिग्रह केवल वस्तु-त्याग नहीं, लालच पर नियंत्रण है। संयम केवल तपस्वी का विषय नहीं, उपभोग, क्रोध और अहंकार से भरे समाज की सामाजिक आवश्यकता है।
चंपापुर को केवल धार्मिक पर्यटन तक सीमित न रखकर विरासत केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। जहां जैन दर्शन, अंग का इतिहास, पुरातात्विक सामग्री और श्रमण परंपरा को एक साथ समझा जा सके। प्रतिमाओं और शिलालेखों का डिजिटल दस्तावेजीकरण हो, विद्यार्थियों को जोड़ा जाए। मंदार और चंपापुर को साझा जैन सांस्कृतिक परिपथ के रूप में विकसित करने पर विचार हो, पर संरक्षण अनिवार्य शर्त हो। अनियंत्रित निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन मूल स्वरूप को नुकसान पहुंचाएंगे, इसलिए स्थानीय समाज, धार्मिक संस्थाओं, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और प्रशासन में समन्वय जरूरी है।
मोक्ष कल्याणक का मूल संदेश यही है,बाहर की व्यवस्था से पहले भीतर की दृष्टि बदलना। भगवान वासुपूज्य की कथा संग्रह की जगह अपरिग्रह, हिंसा की जगह अहिंसा और भटकाव की जगह आत्मबोध की ओर ले जाती है।
चंपापुर की मिट्टी में पांच कल्याणकों की स्मृति है, मंदार पर निर्वाण की परंपरा है। यह केवल जैन समाज की नहीं, भागलपुर और बिहार की साझा विरासत है। यह याद दिलाती है कि अंतिम विजय किसी दूसरे पर नहीं, अपने भीतर के मोह, हिंसा और संग्रह पर होती है। मुक्ति बाहर नहीं, भीतर की शुद्धि से शुरू होती है। (विभूति फीचर्स)
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