करवट बदल बदल के कमी ढूँढते नही,
क्या हो गयी कमी वही आँकते नही।
ए जिंदगी सताती रही आज तो हमें,
बस यूहिं जिंदगी से सबक सिखते नही।
माना मिला है दर्द बताया नही कभी,
खुशियों का दर खुले वो दर माँगते नही।
कैसे कहे ऋतु नादान है सोचे है अब बड़ा,
हालात आप दिल के मगर देखते नही।
सुनते कथा भी राम की मंदिर मे आज तो,
चौपाईयाँ कही जो वही बाँचते नही।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़