neerajtimes.com – अगर उपद्रवी संसद तक पहुंच जाते या अन्दर घुस जाते तब आपको शांति मिलती?? अपनी साहित्य धर्मिता दिखाने के लिए कोई और विषय चुनिये आदरणीय।
कृपया सुरक्षाबलों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठा कर उनके उत्तरदायित्व में बाधा मत डालिये और न ही उनका मनोबल गिराइये। सैकड़ों वीडियो वायरल हैं जिनमे सुरक्षाबलों को provoke किया जा रहा है या उनकी खिल्ली उड़ाई जा रही है।
अगर सुरक्षाबल निष्क्रिय हों तो भी परेशानी, अगर minimum force use की जाए तो भी परेशानी। क्या सुरक्षाबलों ने आरम्भ से ही बल प्रयोग किया(आपके शब्दों में “डंडे” का प्रयोग किया?)
क्या आपने वह वीडियो नहीं देखा जिसमें एक अराजक तत्व बैरियर पर तैनात सुरक्षाकर्मी की आँखों मे पेपर स्प्रे का SPRAY नहीं किया जिसके बाद उस पर डंडा चला। क्या आपने वह दृश्य भी नहीं देखा जिसमें संसद से पहले लगाये गए बैरिकेड्स को पहले कुछ अराजक तत्व लांघने लगे और बाद में सैकड़ों की तादात में उपद्रवी बैरियर के ऊपर से फिर उनको गिरा कर संसद की ओर बढ़ने लगे थे।
ऐसे में क्या पुलिस मूकदर्शक बनी रहती? अगर समय से और समुचित बल प्रयोग किया होता तो 118 के आसपास पुलिसकर्मियों की दुर्दशा भीड़ के द्वारा नहीं होती। सेना में सेवाकाल के दौरान अनेक बार कश्मीर और मणिपुर – नागालैंड में ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, यहां तक कि सुरक्षकर्मियों के हथियार छीनने के प्रयास होते थे ताकि वे रियेक्ट करें फिर VICTIM CARD खेला जा सके।
एक साहित्यकार , सजग और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबका कर्तव्य है कि समाज का सही ढंग से मार्गदर्शन करें और ऐसा प्रयास करें कि सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़े और वह अपना कार्य सही ढंग से कर सकें न कि व्यंग्य जैसी विधा का प्रयोग करके उन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करके उनका मनोबल गिरायें आखिरकार ये सुरक्षाकर्मी ही हैं जिनके पास मुसीबत पड़ने पर हम सबसे पहले जाते हैं। – प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
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