मनोरंजन

धड़कता हुआ दिल – रुचि मित्तल

धड़कता हुआ दिल

किसी इमारत पर रखी अज़ान नहीं है

कि सब सुन लें

वह तो

सीने के अंधियारे में

जलती हुई एक छोटी-सी लौ है

जो हर धड़कन पर

अपना वजूद साबित करती है

कभी वह किसी नाम को पुकारती है

इतनी आहिस्ता

कि खुद ख़ामोशी भी चौंक जाती है

कभी वह

सजदे में झुकी पेशानी जैसा हो जाता है

जहाँ शब्द नहीं

सिर्फ़ समर्पण होता है

मैंने महसूस किया है

कि जब दुनिया की आवाज़ें

बहुत ऊँची हो जाती हैं

तो दिल की सदा

और भी भीतर उतर जाती है

वहीं कहीं

जहाँ रूह सिर्फ़ रोशनी ओढ़ती है

धड़कनें

दरअसल वक़्त की तस्बीह हैं

हर मोती पर

एक याद फिसलती है

एक दुआ ठहरती है

एक अधूरी मोहब्बत साँस लेती है

और फिर

सब कुछ सामान्य दिखता है

लोग समझते हैं

दिल बस खून चलाता है

उन्हें क्या मालूम

वही तो रूह का दरवाज़ा है

जिस पर हर धड़कन

हल्के से दस्तक देती है।

-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

 

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