मनोरंजन

मेरी कलम से – डाo किरण मिश्रा

पहन कर रँग मौसम के गुलाबों सी महकती हूँ।

झटकती जुल्फ से बादल मैं सावन सी बरसती हूँ,

खिली ज्यों धूप बासन्ती पिया पहलू में आ तेरे,

लगा कर प्रीति का काजल मैं कोयल सी चहकती हूँ।

 

वहीं आँखे, वहीं जुल्फें, वही बातें अजब आली,

वही बिन्दी,  वही सुर्खी,  वही  बेंदी, वही बाली,

जरा महसूस होने दो, ये  सांसे और ये धड़कन ,

गज़ब क्या खूब लगती है,तेरी होंठों की ये लाली!

– डाo किरण मिश्रा (स्वयंसिद्धा), नोएडा, उत्तर प्रदेश

Related posts

केसरी नंदन सबको सुमति दो – कालिका प्रसाद

newsadmin

बिंदिया – मधु शुक्ला

newsadmin

चलना होगा – सविता सिंह

newsadmin

Leave a Comment