मेहनत से ज़ग़ को भरमाए,
ऱख़ कर हिम्मत ख़ुशियाँ पाए।
वो है ज़ाज़िब मन को भायी,
चेहरा कोई पढ़ने पाए।
ज़ान स़म़झ ले बात तू म़ेरी
बिन तेरे अब रहा न जाए।
चाँद छूने चली है ब़ेटी,
ज़ग़ मे उँचा नाम कमाए।
प्रेम ज़ता दूँ आँखो से मैं,
प्रेम की ह़द़ मुझको न भाए।
ग़म़दीदा मे ज़ींना कैसा,
मेहनत से खुशियों का पाए।
जीने कब देती है ग़रीबी,
संकट मे भी ना घबराए।
डरना कैसा अब मुश्किल से,
सपनो का इक महल बनाए।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़