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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

मेहनत से ज़ग़ को भरमाए,

ऱख़ कर हिम्मत ख़ुशियाँ पाए।

 

वो है ज़ाज़िब मन को भायी,

चेहरा कोई पढ़ने पाए।

 

ज़ान स़म़झ ले बात तू म़ेरी

बिन तेरे अब रहा न जाए।

 

चाँद छूने चली है ब़ेटी,

ज़ग़ मे उँचा नाम कमाए।

 

प्रेम ज़ता दूँ आँखो से मैं,

प्रेम की ह़द़ मुझको न भाए।

 

ग़म़दीदा मे ज़ींना कैसा,

मेहनत से खुशियों का पाए।

 

जीने कब देती है ग़रीबी,

संकट मे भी ना घबराए।

 

डरना कैसा अब मुश्किल से,

सपनो का इक महल बनाए।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

 

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