राजनीतिक

राजनीति की डिक्शनरी से विलोपित होता विपक्ष (व्यंग्य)  – विवेक रंजन श्रीवास्तव

neerajtimes.com – शब्दकोशों की धूल फांकती पुरानी पांडुलिपियों में विपक्ष नाम का एक शब्द अब भी जीवित है। इसे कभी लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता था, जो अब नितांत भ्रम है। यथार्थ तो यह है कि अब विपक्ष का अर्थ है, अनायास ही स्व-विनाश का कल्पवृक्ष बनना।
देश में राजनीति ने इस अर्थ को इतनी शिद्दत और कलात्मकता से जिया है कि अब डिक्शनरी से इस शब्द को ससम्मान विलोपित कर देना ही जनहित में है। जो दल स्वयं को हलाल करने में ही अपना परम पुरुषार्थ समझता हो, उसे विपक्ष कहना शब्द-ब्रह्म का अपमान है। उन्हें तो आत्म घाती श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए।
भारतीय राजनीति की हालिया टूटन किसी सर्कस के उस मयूर-नृत्य जैसी है, जिसमें पक्षी पंख फैलाने की जगह खुद के ही पर नोचने में व्यस्त है। विपक्ष का बिखराव,त्रासदी नहीं, बल्कि इच्छा-मृत्यु का एक नवाचारी, सौंदर्यपूर्ण मॉडल है। यह वह अद्भुत आत्मघाती तालमेल है, जहाँ हर घटक दल इस होड़ में है कि कौन सबसे पहले इतिहास के कूड़ेदान में अपनी जगह सुनिश्चित करता है।
इस स्व-विनाश यज्ञ में राजुल भूमिका किसी दूरदर्शी मंत्र-द्रष्टा की भांति है,फर्क इतना है कि उनके हर ब्रह्मास्त्र का निशाना स्व स्वार्थ के ही पाँव पर होता है। उनकी सेल्फ-गोल प्रवृति को यदि हम राजनीतिक योग की संज्ञा दें, तो यह अतिशयोक्ति न होगी। जिस प्रकार दधीच जैसे तपस्वी अपनी देह को विस्मृत कर शून्य में लीन होने की चेष्टा करता है, वैसे ही राजुल जी अपनी पार्टी को अस्तित्व के शून्य में विलीन करने की कठिन तपस्या में जुटे हैं। उनके एक-एक वक्तव्य के बाद पार्टी का ग्राफ जिस तरह पाताल-लोक की गुफाओं में अन्वेषण करता है, वह किसी दैवीय करिश्मे से कम नहीं।
और कणिशंकर अय्यर या डीग्विजय जी का तो कहना ही क्या! ये तो वे विलोम भाषी ऋषि हैं जो अपनी वाणी के यज्ञ में विपक्ष की ही समिधाएं डाल देते हैं। जब भी पार्टी को संजीवनी की अपेक्षा होती है, तब तब ये महामहिम अपनी वाक पटुता से पूरी लंका ही दहन कर देते हैं। इनका उल्टा पड़ना भी विपक्ष विलोपन में एक शालीन कला है। ये ऐसे तीरंदाज हैं जो लक्ष्य की ओर देखते हैं, प्रत्यंचा खींचते हैं, लेकिन तीर को अपनी ही छाती में उतारने का आनंद लेते हैं। वे अखबार के फ्रंट पेज मैटिरियल हैं।
इधर बंगाल की राजनीति तो उलट-बांसी का चरमोत्कर्ष है। वहां विपक्ष का होना एक ऐसा अघोषित संन्यास है, जहाँ विरोध करने का अर्थ स्वयं के राजनीतिक अंत्येष्टि संस्कार की तैयारी करना है। बंगाल का विपक्ष आजकल लुका-छिपी के उस खेल में संलग्न है, जिसमें वे खुद को ही नहीं ढूंढ पा रहे। वहां की राजनीति उस चित्रकार की भांति है, जो श्वेत कैनवस पर अस्तित्व उकेरना चाहता है, किंतु अंत में केवल काली स्याही से अपना ही नाम काट देता है। वहां का विपक्ष दीदी के विरुद्ध खड़ा तो होता है, पर सूरज ढलते-ढलते वह स्वयं दीदी के अवसान गान की प्रार्थना सभा में मुख्य अतिथि बन जाता है। यह राजनीतिक रूपांतरण का वह विरल दृश्य है, जहाँ विपक्ष की इल्ली सत्ता के फूल पर बैठते ही तितली बनने के बजाय गायब हो जाती है। आम आदमी का सर्वपांग विलय इस तरह है कि मक्खन निकाल कर बिलाए हुए मठे में फिर से मक्खन को मिला दिया जाए।
अब समय आ गया है कि हम शब्दों के इस बोझ को हल्का करें। विपक्ष के स्थान पर स्वयं-विनाशक शब्द को स्थान मिलना चाहिए। जो दल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय, अपनी ही पार्टी की नींव की ईंटें निकाल-निकाल कर उसी के घर पर बरसाने में निपुण हो, उसे विपक्ष कहना व्याकरण का उल्लंघन है। वे जो कर रहे हैं, वह राजनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक सती-प्रथा है, जहाँ वे अपनी ही पार्टी की चिता पर शान से बिराजे हैं। बस फर्क इतना है कि यहाँ अग्नि प्रज्वलित करने के लिए किसी बाहरी शत्रु की आवश्यकता नहीं, उनके स्वयं के अमूल्य वचन और आत्मघाती रणनीतियां ही पर्याप्त हैं। आने वाली पीढ़ियां जब विपक्ष शब्द का अर्थ ढूंढेगी, तो उन्हें कोई परिभाषा नहीं मिलेगी, बस एक लंबी हंसी सुनाई देगी। (विभूति फीचर्स)

Related posts

अशोभनीय आचरण वाले पार्टी प्रवक्ताओं पर अंकुश आवश्यक – डॉ. सुधाकर आशावादी

newsadmin

संविधान की दुहाई और अराजकता का खेल – डॉ. सुधाकर आशावादी 

newsadmin

धन और समय की बर्बादी से बचाव – एक देश एक चुनाव – डॉ. सुधाकर आशावादी

newsadmin

Leave a Comment