मनोरंजन

अनजान – प्रदीप सहारे

 

शहर में बनती हैं,

ऊँची-ऊँची इमारतें।

कहीं शहर से दूर,

कहीं शहर के पास।

सपने लेकर आते हैं,

एक-दूजे से अनजान।

ऊँची इमारतों के संग,

ऊँचे-ऊँचे सपनों के संग।

बसते हैं धीरे-धीरे,

इन ऊँची-ऊँची इमारतों में।

बनते हैं कुछ रिश्ते,

बोलचाल के, मुँह बोले।

भैया, भाभी, अंकल, आंटी—

रिश्ते धीरे-धीरे होकर गहरे,

बन जाते हैं कुछ ‘ब्रो’।

जानने लगते हैं एक-दूसरे को,

होती है चेहरे पर मुस्कराहट।

मिलते हैं लिफ्ट या पार्किंग में,

हँसते हैं गाल ही गाल में।

मिलते हैं कभी किसी विवाह में,

देखते हैं दूर से या छत से,

झाँकते हैं खिड़की से,

किसी की निकली अर्थी को।

ना जाने कब, कैसे !

खटकने लगते हैं ये रिश्ते—

कभी किसी दरवाजे पर,

रखे जूते-चप्पल पर,

या पार्किंग में खड़ी गाड़ी पर।

और फिर बन जाते हैं,

एक-दूसरे के लिए,

जानकर भी अनजान।

प्रदीप सहारे, नागपुर

मोबाईल -7016700769

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