मनोरंजन

ग़ज़ल – मणि अग्रवाल

चाहिए अब नहीं रोज़ वादे  नये,

बोलिए आप  अपने  इरादे  नये।

ख़त्म हो जाएँगे फ़ासले फिर सभी,

सिर्फ़ संवाद के पुल बना दे नये।

पाँव अहसास के हैं सुकोमल बहुत,

भावना के ग़लीचे बिछा दे नये।

ज़िन्दगी अब हुई खेल शतरंज का,

जीतना है अगर ढूँढ़ प्यादे नये।

एक विश्वास की शर्ट ही ठीक है,

ओढ़ मत तू भ्रमों के लबादे नये।

दे सकूँ जो तुझे शेष कुछ भी नहीं,

दर्द  तू  कर नहीं  अब तग़ादे नये।

ख़्वाब फिर से हसीं पास तक आ सकें,

वो तरीक़े मुझे भी बता दे नये।

-मणि अग्रवाल”मणिका”, देहरादून उत्तराखंड

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