मनोरंजन

दोहा मुक्तक – सुधीर श्रीवास्तव

जिंदा होकर स्वयं को, मुर्दा माने लोग।
जाने क्यों हैं सोचते, उन पर है अभियोग।।
समझ नहीं है आ रहा, कैसी है यह रीति –
कोई बतलाए मुझे, रोग है या संयोग।।

हर प्राणी पर डालता, ग्रहण अपना प्रभाव।
कुछ पाते हैं बहुत कुछ, कुछ को मिले अभाव।।
दीन, धर्म, ईमान भी, घोले इसमें रंग –
सबकी अपनी भूमिका, सबका अलग स्वभाव।।

बढ़ता जाता जाल है, आज युद्ध का रोज।
पहले आपस में लड़ें, बाद शान्ति की खोज।।
कोशिश पहले हो अगर, तब बिगड़े क्यों बात-
पर दंभी जन मगन हैं, सारी दुनिया भोग।।

यादों के साए हमें, रुला रहे हैं रोज।
कभी-कभी लगता हमें, नाहक है ये खोज।
जितना हम हैं चाहते, दूर रहें ये रोग-
उतना ही हमको लगे, जैसे प्यारा भोज।।

सप्त सुरों के मूल का, सरगम है आधार।
सुर साहित्य के भाव, पढ़-सुन करें विचार।
गीत ग़ज़ल कविता लिखें, सब अपने प्रिय छंद-
सबको अपने दर्द का, मरहम सरगम संसार।।

जैसा सोचा था नहीं, वही सामने बात।
वाणी में रस घोलकर, होता है प्रतिघात।
टूट गया अब आज मैं, देख जगत की चाल-
बेशर्मी भी गर्व से, आज मारती लात।।

प्रिये मित्र यमराज की, मानी जबसे बात।
तबसे अपनी कट रही, बड़े प्रेम से रात।
शुभचिंतक अब कौन है, कैसे कह दूँ आप-
भला समझता कौन है, अब मेरे जज़्बात।।

मन उपवन सूना हुआ, मौन हृदय के भाव।
कैसी माया राम की, गहरे होते घाव।
इसमें किसका दोष है, सबसे बड़ा सवाल –
उत्तर कोई दे मुझे, जिसको बड़ा लगाव।।

-सुधीर श्रीवास्तव, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

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