बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
दूध घी बादाम अभी तो मैं जवान हूं।
उम्र ढले या न ढले दिल रहे कायम ।
मन से रहता बच्चों का मै कायल।
रहता सोना जगना खाना नियम से।
टहलना हंसना खेलना सब नियम से।
खट्टा मीठा तीखा खाने नहीं अंजान हूं।
बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
हवा पानी राशन सब है मिलावटी बड़े।
फल फूल सब्जियां सब है सजावटी बड़े।
ठेलो पटरियों होटल मिले सब सड़े गले।
जांच परख के खाना नहीं मैं हैरान हूं।
बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
भूख से पहले और ज्यादा न खाता हूं।
जो भी खाऊं दांतों से खूब चबाता हूं।
शाकाहारी भोजन संग सलाद पसंदहै।
जल्दी सोना जल्दी जागने में आनंद है।
संयमित व स्वस्थ जीवन मैं विज्ञान हूं।
बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
जीवन में है उथल पुथल व संघर्ष बड़े।
निपटना है सबसे करना है विमर्श बड़े।
चिंता उदासी और बचना घबड़ाहट से।
मुश्किल हो दूर लड़ना छटपटाहट से।
झुर्रियों में हंसकर जीना मै आसान हूं।
बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
माना हार जिस तब दिन बुढ़ापे आएंगे।
घेरेंगे सब बूढ़े अंग हमे और सताएंगे।
करो योग और रहो निरोग सुंदर मंत्र।
खान पान आदतें करे स्वस्थ तन तंत्र।
भारती सुंदर सजीला मै प्राणायाम हूं।
बूढ़ा न नादान अभी तो मैं जवान हूं।
– श्याम कुंवर भारती, बोकारो, झारखंड