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प्रेम – रेखा मित्तल

प्रेम कब पूर्ण होता हैं
अधूरे ख्वाब ही जीने का सबब देते हैं
प्रेम राधा का हो, या मीरा का
प्रेम का अंत, पाना नहीं हैं
प्रीत लैला की या शीरी की
सब अधूरी ही रह गई
शायद प्रेम के हिस्से आता हैं अधूरापन
मैंने भी प्रेम किया था कभी
पर मुझे भी मिला वही अधूरापन
तुमने भी तो कभी प्रतिकार नहीं किया
अपनी परिस्थितियों से,अपने संघर्ष से
शायद त्याग ही प्रेम हैं
पा लेती तो भूल जाती वह जज्बात
जो आज भी संजोए बैठी हूँ
उम्मीद हैं शायद कभी मिल जाओ
जीवन की इस भाग दौड़ में
प्रेम का बादल सा बरस जाओ
यादों की अनमोल धरोहर हैं मेरे पास
जिनको सीने में दफन कर रखी हैं
कभी-कभी ज्वालामुखी सी उमड़ पड़ती हैं
तो याद बहुत आते हो
पर मैने भी तुम्हारे बिन जीना
बखूबी सीख लिया हैं
अब तो मैं इन यादों को छुपा कर
मुस्कुराना भी सीख गई हूँ
शायद यही प्रेम है।
– रेखा, मित्तल , चंडीगढ़

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