मनोरंजन

मदर्स डे वाला प्यार – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

मदर्स डे जब आता है,

घर का हर कोना छाना जाता है,

अचानक सबको याद आता —

“माँ के साथ फोटो कहाँ रखा जाता है?”

अलमारी खुलती, बक्से खुलते,

पुराने एलबम झट से धुलते,

कल तक जो माँ की सुनते ना थे,

आज स्टेटस के लिए पीछे घूमते।

कोई बोले — “मम्मी इधर आओ,”

कोई कहे — “थोड़ा मुस्कराओ,”

फेसबुक वाली दुनिया खातिर

माँ को फिर से याद दिलाओ।

जिस माँ ने सारी उम्र बिताई

बिना किसी छुट्टी, बिना कमाई,

उसके हिस्से साल में केवल

एक पोस्ट और दो लाइन आई।

“मेरी माँ मेरी जान है” लिखकर

दिल वाला इमोजी लगाते हैं,

फिर वही लोग अगले दिन से

माँ को टाइम नहीं दे पाते हैं।

माँ रसोई में रोटी सेंके,

बेटा रील बनाता रहता,

“Happy Mother’s Day Mom” लिखकर

खुद को अच्छा बताता रहता।

सच तो ये है माँ को केवल

फोटो वाला प्यार नहीं चाहिए,

थोड़ा सम्मान, थोड़ा समय,

बस इतना सा उपहार चाहिए।

मदर्स डे पर पोस्ट लगाने से

फर्ज़ नहीं पूरा होता है,

माँ तो वो किताब है साहब,

जिसे रोज़ पढ़ना होता है।

– राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम, छत्तीसगढ़

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