मनोरंजन

अंगीकार- सविता सिंह

चोरी-चोरी सबसे छिपकर,

कहते नैन तुम्हारे अक्सर,

जितना उनको समझ सके हम,

क्या तुम इतना प्यार करोगे?

बार-बार हर बार करोगे?

क्या मुझको स्वीकार करोगे??

हमें नहीं चालाकी आती,

कभी समय पर कह न पाती।

लेकिन तुमको इतना जाना,

तुम समझे मुझको निज थाती।

कभी रूठ जाऊँ जो तुमसे

तो क्या तुम मनुहार करोगे?

तुम उतना ही प्यार करोगे?

कहो प्यार स्वीकार करोगे??

मन में उमड़े कितनी बातें,

जागीं हमने कितनी रातें।

पवन वेग से आते चुंबन,

मिली अधर को ये सौगाते।

आस लगी है मुझको लेकिन,

कब तुम अंगीकार करोगे?

क्या तुम भी इकरार करोगे?

तुम उतना ही प्यार करोगे??

नैन नैन जब भी मिलते,

कहते-कहते होंठ ठहरते।

वह अनछुआ प्रणय निवेदन,

सोच-सोचकर रोज सिहरते।

सच कहना बाहों में भरकर

कब मेरा श्रृंगार करोगे?

क्या तुम छक कर प्यार करोगे?

क्या मुझको स्वीकार करोगे?

– सविता सिंह मीरा , जमशेदपुर

 

Related posts

अपनी भाषा का अपमान हम कब तक सहेंगे – कवि संगम त्रिपाठी

newsadmin

आत्मावलोकन – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

newsadmin

परिंदा – सुनील गुप्ता

newsadmin

Leave a Comment