फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में, उस जीवन का कोई मतलब नहीं।
जो चाहता है सिर्फ अपनी ही खुशी, उस आदमी की कोई जरुरत नहीं।।
फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में————।।
हर किसी को चाहिए, वह करें ऐसी प्रार्थना।
सबको खुशी मिले, ऐसी हो सबकी आराधना।।
आबाद होना जो चाहता है सिर्फ खुद, उस आदमी की अच्छी हसरत नहीं।
फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में———–।।
सामने तो करें वह ताहिद किसी की, बाद में बुराई वह उसकी करें।
करने को कर ले वह वादे हजार, मगर कोई वादा पूरा वह नहीं करें।।
मुसीबत में साथ जो देता नहीं है, वह आदमी किसी का सच में दोस्त नहीं।
फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में———–।।
उपकार करके अगर कोई, करता है बहुत अहम।
वही फिर चोरी-छुपकर, करता है जुल्मो-सितम।।
वसूले जो अपने उपकार की कीमत, उस आदमी का मकसद अच्छा नहीं।
फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में————-।।
पाप अपने जो छुपाये, पहनकर चेहरे पर नकाब।
होना चाहे जो मकबूल, लूटकर किसी का सबाब।।
ऐसे इंसान की हकीकत यही है, कि अकीदत उसकी कोई भी करता नहीं।
फ़क़त कैद है जो अपने ही स्वार्थ में————-।।
-गुरुदीन वर्मा .आज़ाद
तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)