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भावभरी शरद पूर्णिमा – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

पूर्णिमा सुंदर शरद की मन उमंग जगा रही।
सौध के सम चाँदनी सबके ह्रदय को भा रही।1

श्वेत चादर सी बिछी तारे मलिन अब हो गए।
रातरानी हो सुवासित सृष्टि को महका रही।2

रागिनी झींगुर सुनायें संग दें दादुर कई।
खिल कमलिनी झील में निज रूप पर इठला रही।3

रास करने के लिये आतुर हुए नर-नरियाँ।
कूक कर कोयल कहीं मधु गान को उकसा रही।4

कृष्ण के सम भाव जीवन में उतारें हम सभी।
हो समागम प्रकृति के सँग रात यह बतला रही।5

स्वस्थ्य बलशाली बनें सब रश्मि चंदा को कहे।
जो अमर कर दे मनुज को वह अमिय छलका रही।6

हो सुवासित हर हृदय जग सकल संपन्न हो।
पूर्णिमा अब शरद की यह आस मन पनपा रही।7
– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा,उत्तर प्रदेशः

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