जख्म देके कहें मजहबी हम नहीं,
दे दगा बोलते अजनबी हम नहीं।
पाठ उलटा पढ़ाके छुपे हो कहाँ,
झूठ बोलें कहें नफरती हम नहीं।
दिल जलाते हमेशा करें दुश्मनी,
बोलते हर घड़ी की छली हम नहीं।
चाल जो भी चलो मानतें हम दगा,
मान तेरा करेंगे कभी हम नहीं।
जो करोगो भरोगे मिलेगी सजा,
बीर नारी यहाँ बोलतीं हम नहीं।
वार उलटा पड़ेगा जरा सोंचना,
माफ करदें तुम्हें आदमी हम नहीं।
प्यार की ये जमीं जान देते सभी,
माँग लेना दुआ जिंदगी हम नहीं।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।