मनोरंजन

फिर वो ही – सविता सिंह

वर्षों बाद

वही आवाज

उसी नाम से

पुकारा किसी ने।

भीड़ को चीरती हुई

कानों से दिल तक

रुक गए कदम

धड़क उठा मन।

पलट के देखा

हाँ थे तुम

हजारों की भीड़ में

सिर्फ तुम दिखे।

तुम्हारी नजर भी

हम पर ही टिकी

बीते सारे वर्ष

पलक झपकते

तैर गई आंखों पर।

मूक अधर

सवाल पूछती नजर

थे किधर?

रखे हो वही कुर्ता

मन तेरा अब भी रीता

संजोये हो सारे क्षण।

वेदना संवेदना

सबको छिपाती

सब को दबाती

फिर भी पढ़ लिए

मेरे नैन मेरा मन ।

जल रही थी अगन

कैसे बढ़ाऊँ ये कदम।

जी चाह रहा था

ना करूँ जमाने की फिकर

रो लूँ कंधे पर रखकर सर।

सहसा आवाज आई

चलो भी कहाँ खो गई

फिर बीस वर्ष पलट गये

आ गई यथार्थ पर पर।

आज ना जाने क्यों

बेमतलब बेवजह

लड़ झगड़ कर

बहुत रोई तकिया भिगो कर।

शायद वो पुराना दर्द

हावी हुआ आज पर

दफन ही रहें तो बेहतर।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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