दर्द-ए-दिल अपना बताने लगे ,
रिश्ते मुझसे वो जताने लगे।
मैं भी रहा खामोश, देर तलक ,
पर सब्र मेरा, आजमाने लगे।
कसूर आँखों का था,लड़ गयी,
सजा दिल-ए-गरीब,पाने लगे।
तीर-ए-नज़र का जलवा देखो,
माकूल एक दम निशाने लगे।
देख के बेवफा गैर की जानिब ,
दानिस्ता दिल जलाने लगे।
इस कदर समां गयी दिल में ,
भूलाने में उसे जमाने लगे।
हो गए बे-खबर, जब निराश ,
मैय्यत आरज़ू की उठाने लगे।
– विनोद निराश देहरादून