न रोकूँगी शपथ लेती,नयन भर देख लूँगी बस ।
चले जाना ,चले जाना ,बलम! आकर चले जाना।
निलय के गुलमुहर को बस,प्रतीक्षा भर तुम्हारी है ।
तनिक कुम्हला गई लगती,सुमन की भग्न क्यारी है ।
बरसना री !न उन पर तुम,महज छाकर चले जाना ।
चले जाना,चले जाना—
थके हैं नैन विहगों के,चहकना भूल बैठे हैं ।
सुमन इन पारिजातों के,महकना भूल बैठे हैं ।
सुरभि इनके लिए प्रियतम! कभी लाकर,चले जाना ।
चले जाना,चले जाना—
न बनना गीत जीवन के,निमिष भर गुनगुना लूँगी ।
व्यथा अपने हृदय की तो, तुम्हें क्षण भर सुना लूँगी ।
प्रणय की एक पंक्ति तुम,सखे !गाकर चले जाना ।
न रोकूँगी शपथ लेती, नयन भर देख लूँगी बस ।
चले जाना, चले जाना,बलम! आकर चले जाना ।
– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका , दिल्ली