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चले जाना – अनुराधा पाण्डेय

न रोकूँगी शपथ लेती,नयन भर देख लूँगी बस ।

चले जाना ,चले जाना ,बलम! आकर चले जाना।

निलय के गुलमुहर को बस,प्रतीक्षा भर तुम्हारी है ।

तनिक कुम्हला गई लगती,सुमन की भग्न क्यारी है ।

बरसना री !न उन पर तुम,महज छाकर चले जाना ।

चले जाना,चले जाना—

थके हैं नैन विहगों के,चहकना भूल बैठे हैं ।

सुमन इन पारिजातों के,महकना भूल बैठे हैं ।

सुरभि इनके लिए प्रियतम! कभी लाकर,चले जाना ।

चले जाना,चले जाना—

न बनना गीत जीवन के,निमिष भर गुनगुना लूँगी ।

व्यथा अपने हृदय की तो, तुम्हें क्षण भर सुना लूँगी ।

प्रणय की एक पंक्ति तुम,सखे !गाकर चले जाना ।

न रोकूँगी शपथ लेती, नयन भर देख लूँगी बस ।

चले जाना, चले जाना,बलम! आकर चले जाना ।

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका , दिल्ली

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