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ग़ज़ल – डॉ0 अशोक पाण्डेय

कोई तन्हा नहीं रहे जब माँ ने यह सोचा होगा,
तब जा करके मेरे भाई को माँ ने जन्मा होगा।

बिना पुत्र के वंश कहाँ परिवार कहाँ चल पायेगा,
यही सोचकर मेरा भाई दादा के घर आया होगा।

सुख-दुःख का साथी दुनिया में बस केवल ही भाई है,
इसी भाव से हर भाई ने भाई को चाहा होगा।

सबको मिलकर जीने का अधिकार मिल सके इसीलिए,
बंटवारे से बचकर रहना ही सबसे अच्छा होगा।

सारे रिश्ते- नाते हैं तो बस केवल हैं जीवन तक,
इसी बात को जाने वालों ने बेहतर समझा होगा।

बात याद रखना यह बेटे व्यर्थ नहीं जाने देना,
जो भी तुम्हें मिला है उसमें पुरखों का हिस्सा होगा।

खेत- बाग -घर – आंगन ‘ गुलशन ‘ यहीं धरा रह जायेगा,
सबको खाली हाथ एक दिन दुनिया से जाना होगा।

-डॉ0 अशोक पाण्डेय ‘ गुलशन ‘
-उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच, उत्तर प्रदेश।

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