मनोरंजन

गजल – नीलांजना गुप्ता

दृगों से आँसू नहीं यह लहू मेरा बह रहा है,

गमों की इस बाढ़ में स्वप्न ढहकर गिर रहा है।

 

दुनियाँ की नजरों में दीपावली के हैं दीप रोशन,

किसी को क्या खबर मेरा आशियाँ जल रहा है।

 

बहारे आई गई फूलों से महकी वादियाँ,

मेरे घर में पतझड़ ही मेहमान बनकर रह रहा है।

 

मोम मैं भी हो गई हूँ देखने में जो ज्वलित है,

किन्तु अंतस्थल में यारो पिघलकर वह गल रहा है।

– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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