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चला रहे आरी, बनें स्वयं के अरि – सुनील गुप्ता

( 1 ) बनें स्वयं के वो अरि, जो चला रहे वृक्ष पे आरी

हैं ये ख़ुद के दुश्मन, करें घात-प्रतिघात भारी !!

( 2 )

है ये कलियुग और गई इन सबकी मति मारी

कौन समझाए बाँधी स्वार्थ की पट्टी है काली !!

( 3 )

असुर शक्तियाँ जो चले बसाए ये पांच देहदारी

बनाती हैं कामी क्रोधी लोभी मोह अहंकारी !!

( 4 )

ए पागल, डाल को काट मत, देख तो तू जरा

जिस शाखा पर बैठा, मत चला उसपे आरी !!

सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान

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