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नासमझी और उत्सुकता के बीच फंसती किशोरियां – आर. सूर्य कुमारी

neerajtimes,com – आज की तारीख में भारतीय किशोरियां बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रही हैं। थोड़ी समझ और थोड़ी नासमझी के पाटों के बीच वे बुरी तरह फंसती चली जा रही हैं। जीवन का अर्थ थोड़ा मालूम, थोड़ा नहीं मालूम है। नया-नया शरीर बनता है तो उनमें उत्सुकता ज्यादा रहती है। अपने शरीर के साथ प्रयोग करने की प्रबल इच्छा होती है। और तो और, कुछ किशोरियां जमाने को, जमाने के रंग को इतनी ज्यादा पहचानती हैं कि अपने जीवन को सूली पर चढ़ा देती हैं।
परिणाम यह होता है कि किशोरियां शोहदों के जाल में फंस जाती हैं। धीरे-धीरे दोस्ती, फिर उनका शारीरिक शोषण शुरू हो जाता है। जब तक वे होश संभालती हैं, तब तक पूरी तरह लुट चुकी होती हैं।
किशोरियों के संभलने का समय तब होता है, जब कोई युवक उन्हें झांसा देकर, लालच देकर, मीठे-मीठे सपने दिखाकर अपने वश में कर लेता है। उनका दिमाग इस हद तक धो डालता है कि किशोरियां माता-पिता, भाई-बहन, भैया-भाभी,किसी का ख्याल नहीं रखतीं, किसी की नहीं मानतीं, बस अपनी धुन पर अड़ी रहती हैं। अपने आप को तबाह करके ही मानती हैं।
इन किशोरियों को तबाही से बचाने का सबसे बड़ा उपाय घर से ही निकलता है। माता-पिता को सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए। कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है। माता-पिता को अपने मन पर लगाम लगानी होती है। किशोरियों को माता-पिता संस्कारी माता-पिता दिखने चाहिए। घर में पूजा-पाठ का माहौल बनाना पड़ता है। उन्हें पूजा-पाठ के साथ जोड़कर रखना होता है। उन्हें अपनी सभ्यता-संस्कारों के साथ जोड़कर रखना होता है। उन्हें सिखाना होता है कि घर व समाज के बड़े-बुजुर्गों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, परिजनों व बंधुओं के साथ कैसा आचरण किया जाए?
किशोरियां चूंकि मध्यम स्थिति में फंसी होती हैं, इसलिए उन पर माता-पिता व परिजनों की जबर्दस्त छाप पड़ती है। वे सीखने में सबसे ज्यादा एक्सपर्ट होती हैं। माता-पिता व परिजन अपनी इच्छा को दबा सकते हैं। हिंसा और अश्लीलता वाली फिल्में और रील्स किशोरियों के सामने नहीं देखने चाहिए। उन्हें स्वच्छ व धार्मिक फिल्में देखनी चाहिए।
किशोरियों के मन में रामायण, महाभारत, मानस आदि को बसाया जाना चाहिए। किशोरियों को आधुनिक शिक्षा के साथ साथ ,भारतीय श्रृंगार, नृत्य, कला के प्रति जागरूक बनाना माता-पिता व परिजनों के वश की ही बात है। किशोरियां किस संगत में हैं, किसके साथ स्कूल-कॉलेज में समय बिताती हैं, यह सब जानना माता-पिता व परिजनों द्वारा ही संभव है। स्कूल में गड़बड़ी हो तो प्रिंसिपल से अविलंब शिकायत करनी चाहिए।
जब किशोरियां बीस-इक्कीस के आसपास पहुंचती हैं, काफी सुलझ गई होती हैं। अपने आप को ब्रेनवॉश से बचा सकती हैं। अपने हर अनुभव को अपनी मां या दीदी से शेयर कर सकती हैं, सकारात्मक समाधान पर पहुंच सकती हैं, गलत संगत में पड़ने से खुद को बचा सकती हैं, सिर उठाकर जी सकती हैं। संस्कारों के साथ जी सकती हैं, और अपनी अगली पीढ़ियों के लिए अपने माता-पिता समान संस्कार ही अपने अंदर पनपा सकती हैं।
ये किशोरियां आगे चलकर अपने बच्चों को लालच में कभी नहीं पड़ने देंगी और ईश्वर ने जो दिया, उसी सीमा में खुश रहने का पाठ पढ़ा सकेंगी। (विभूति फीचर्स)

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