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अपना घर – रेखा मित्तल

अपना घर

मेरा घर कौन सा हैं?

मैने खुद का घर नहीं बनाया

जिंदगी के इस पड़ाव पर

कौंधता हैं यह प्रश्न

आकर मुझे आधी रात में

अधसोई सी मैं

उलझ जाती हूं अपने विचारों में

कश्मकश चलती हैं

दिल और दिमाग में

दिल कहता हैं सब तेरे हैं

पर दिमाग प्रश्न उठाता हैं

झांक कर देख दिल में

सचमुच कौन हैं अपना

बचपन खेला पिता के घर

एक क्षण में वह भी पराया हो गया

सींचती रही जीवन भर

अपने तन मन धन से इस आंगन को

पर यहां भी तो मैं पराई हूं

यह घर भी मेरा नहीं हैं

घर के बाहर तख्ती भी मेरे नाम की नहीं

स्त्रियां अपने घर क्यों नहीं बनाती

आश्रित रहती हैं क्यों हमेशा औरों पर

ऐसा घर जो उसका अपना हो

जिसकी हवा में बंधन न हो

ऐसी दीवारें जो सहलाए

उसके मन को और तन को भी

जहां जमीन भी उसकी हो

और आसमान भी उसका अपना हो

अपने एहसासों को सजाए

मेजपोश की कढ़ाई में

अपने मन को बुने

पर्दो की सिलाई में

पोत दे सारे घर को

अपनी पसंद के रंगों से

अलगनी पर टांक गमों को

चिड़िया सी चहचहाए

रसोई में भी खुशबू आए

उसके मनपसंद पकवान की

कोई ऐसा हो जो सुने

उसके अंतर्मन में चलते द्वंद को

महसूस करे उसकी आंखों की नमी को

बनाना हैं एक आशियाना  ऐसा

जो बस मेरा अपना हो

रेखा मित्तल, चंडीगढ़

 

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