इंसान रहने दो
मत लिखो मुझ पर कविता
थक गई हूँ संघर्ष करते करते
मुझे भी आज़ाद रहने दो
जीना चाहती हूँ मैं भी
नहीं चाहती मेरी पूजा करो
क्योंकि नहीं दे पाऊँगी बलिदान मैं
बस अब ओर त्याग नहीं
मुझे भी इंसान रहने दो
मत ढालो मुझे अपने बनाए सांँचो में
मैं भी उन्मुक्त आकाश में उडना चाहती हूँ
अपने ख्वाबों को सजाकर
मैं भी जीना चाहती हूँ
न मैं देवी ,न सरस्वती
तो एक हाड-मांस का इंसान हूँ
नहीं रह सकती मैं हरदम सशक्त
मैं भी कमजोर होती हूँ
भावनाओं और एहसासों से आकंठ
मैं भी अश्क बहाती हूँ
मत समझाओ मुझे अपनी मजबूरी
मुझे इंसान रहने दो
मैं हर समय नहीं लड़ सकती
थकती हूँ मैं भी रोज दौड़ते-दौड़ते
कोई मेरा भी सहारा बने
मेरे मन को भी समझे
चाहती हूं एक स्नेहिल स्पर्श
नहीं चाहिए कोई प्रमाण पत्र
अपने त्याग और बलिदान का
नहीं चाहती कुछ ओर समझना
मुझे नासमझ रहने दो
खत्म हो गई ताकत मेरी
मुझे भी इंसान रहने दो
– रेखा मित्तल, चंडीगढ़