neerajtimes.com – अचानक से जो समाज में एक बहस छिड़ गई है सेक्सुअलिटी पर खुलकर बोलना अश्लील है फुहड़ है,या यह हमारी मान मर्यादा के खिलाफ है तो सबसे पहले उन महान आत्माओं के लिए ही कहना चाहूंगी कि तुम पृथ्वी पर कोई यज्ञ कुंड से उत्पन्न या देवीय वरदान नहीं हो, आप भी उसी स्वाभाविक प्रक्रिया से इस धरा में विराजमान हो जिसे सम्भोग कहते हैं। और आपकी पीढ़ी भी उस सबसे ही तैयार हो रही है।
दिक्कत कहां आ रही है इस स्वाभाविक इच्छा पर खुलकर बात हो रही है,या एक स्त्री ने इतनी हिमाकत कर दी है कि आप बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हो स्त्री इस कदर बोल्ड है।
दरअसल हमें हमेशा से ही झूठे आवरण में रहने की आदत हो गई है ,हम उसी खोल में खुश है।
बात यह नहीं है कि यौन इच्छाओं पर बात हो रही है, बात यह है कि इस सारे विषय को ग़लत या सही ठहराने वाले तथाकथित सभ्य लोग, मुझे समझ नहीं आ रहा इस पर बहस करनी ही क्यों है ?
इस बात को इतनी हवा देनी ही क्यों है? क्या जितना भी ज्ञान आप अर्जित करते हैं चाहे वो किसी भी विषय पर हो उसका इस तरह ढिंढोरा पीटते हैं,
तो फिर इस बात पर इस तरह का हो हल्ला क्यों?
यह मानवीय गुण ही है कि हम उसी वस्तु की ओर आकर्षित होते हैं उसी पर अधिक बात करते हैं जो हमें हमारी संतुष्टि के अनुकूल प्राप्त नहीं होता है,
जिसे प्राप्त है उसके लिए पर्याप्त है वो इस सब पर कुछ बोलेगा ही नहीं। यह भड़ास वही लोग निकाल रहे हैं जो कहीं न कहीं वंचित हैं।
हैरानी वाली बात है कि यह समाज आज भी एक मजबूत अपने तरह से जीने वाली स्त्री को झेल नहीं पाता है,
मैंने वह समाज भी देखा है या आज भी है जहां घर में आयी बहु अपने ससुर या जेठ को एक डिस्टेंस मेंटेन करके नीचे पानी का गिलास रखती है हाथ पर नहीं देती अब सोचने वाली बात यह है कि वह बहु अस्पृश्य है,या वह जेठ अस्पृश्य है,या यह समाज अछूत है जिसने इस तरह के दायरे बनाएं हैं।
और एक मज़ेदार बात है या रीति रिवाज का ढोंग ही कहूंगी कि अपनी बेटियों के लिए उनके यह सारे नियम कानून बदल जाते हैं।
कहने का सीधा मतलब यही है कि हम अभी भी उस सोच में कहीं बंधे हैं या दूसरे को बांधना चाहते हैं जिसे पितृसत्तात्मक कहते हैं।
एक बेटी जब जन्म लेती है और तेरह चौदह वर्ष में प्रवेश करती है तो उसे उसके एजुकेशन की जरूरत पड़ेगी कि उसे अब आने वाले जीवन में कितनी मुश्किलों का सामना करना है अपने बॉयलोजिकल हार्मोन्स चेंजिंग को किस तरह मेंटेन करना है, अब यह बात तो वहीं समझ सकता है जिसके साथ यह सब घटेगा
मैंने वह समय भी देखा है या आज भी कहीं है कि बेटियों को जब यह एजुकेशन नहीं मिल पाई तो बहुत दफा उनको शर्मिंदगी और ऑकवर्ड वाली स्थिति से गुजरना पड़ा।
ठीक उसी प्रकार से फीजिकल रिलेशन पर खुलकर बात करना भी है और कोई स्त्री इस टॉपिक पर ग्रेसफुल तरीके से बात करती है आपको आडम्बर और नकली व्यवहार से रू-ब-रू करवाती है कृपया उसे चरित्र प्रमाण-पत्र बांटना शुरू मत कीजिए।
स्वघोषित सभ्य समाज का सबसे आसान तरीका है कि किसी स्त्री को यदि नीचे गिराना हो तो उसके चरित्र पर उंगलियां उठा दो।
बेबाक बोलना बिंदास जीना चरित्रहीन होना नहीं होता है बल्कि यह वह दर्पण है जिसमें हर कोई अपना चेहरा देखने का शायद साहस न जुटा पाए। दिनकर की पंक्तियों के साथ –
“तुम रजनी का चांद बनोगे, या मार्तण्ड प्रखर,
एक बात पूछनी है तुमसे, फूल बनोगे या पत्थर”
– ज्योत्स्ना जोशी #ज्योत, देहरादून, उत्तराखंड