मनोरंजन

धूप अब कह रही – डॉ. प्रियंका सौरभ

तप्त धूप अब कह रही, सुनो धरा की पीर।
सूखे वन-उपवन हुए, रोए झरने-नीर।।

सूरज अग्नि उगल रहा, झुलसे सब इंसान।
छाँव खोजते फिर रहे, पशु-पंछी हैरान।।

बिन पानी के हो गए, सूने खेत-खलिहान।
आकाशों से पूछती, धरती अपनी जान।।

लू के तीखे तीर से, घायल हुआ समाज।
दोपहरी की आग में, जलते सब अंदाज़।।

नदियों का घटता जल, देता यही संदेश।
प्रकृति से खिलवाड़ का, मानव भुगते क्लेश।।

पेड़ों की हर कट रही, जीवन वाली साँस।
हरियाली के बिन यहाँ, सूख रही है आस।।

तप्त धरा की वेदना, सुन ले रे इंसान।
प्रकृति माँ के क्रोध का, मत कर अपमान।।

बरखा रानी आ मिलो, लेकर शीतल छाँव।
जलती धरती को मिले, फिर हरियाले गाँव।।

‘सौरभ’ प्रकृति प्रेम से, बदलेगा परिवेश।
धरती फिर शीतल बने, महके अपना देश।।

– डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर,
हिसार (हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570

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