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जिज्ञासा – नीलांजना

मानव जिज्ञासा ही वर्तमान परिणाम है।

नित नए विश्व में करता अनुसन्धान है।।

 

जिज्ञासा बीज है जिसमें वट वृक्ष समाया है।

सम्पूर्ण जगत जिज्ञासा की ही तो माया है।।

 

जिज्ञासा स्व का निरूपण चेतन संचार है।

जिज्ञासा जीव का सबसे श्रेष्ठ उद्गार है।।

 

जिज्ञासा आत्मप्राकट्य का यथार्थ है।

जिज्ञासा जीव का श्रेष्ठतम परमार्थ है।।

 

जिज्ञासा प्रकरण भागवत गीता में आया है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भलीभाँति समझाया है।।

 

जिज्ञासा ने ही पँख दिये हैं उड़ान को।

जिज्ञासा ने एक पैर से नापा जहान को।।

 

जिज्ञासा के अभाव में मानव जाति पंगु है।

सामर्थ्य, शक्ति होते हुए भी केवल त्रिशंकु है।।

 

जिज्ञासा क्षितिज के उस पार ले जाती है।

जिज्ञासा प्रवृत्ति आत्मसाक्षात्कार कराती है।।

 

जिज्ञासा शक्ति है जिसमें सब कुछ समाया है।

मनुष्य को मनुष्य रूप में जीना सिखाया है।।

 

जिज्ञासा शब्द अपने आप में अनोखा है।

लिखा जाय तो महाकाव्य भी छोटा है।।

-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

 

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