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आदर्श जीवन – जया भराड़े बड़ोदकर 

neerajtimes .com – सुबह-सुबह की ठंडी हवा आज बहुत सुकून दे रही थी। श्यामा ने रोज की तरह आज फिर घूमने निकल पड़ी थी। घर में रविवार के दिन किसी को भी उठने की जल्दी नहीं रहती। और श्यामा रोज की जिम्मेदारी से बाहर निकल गई। थोड़ी दूरी पर ही उसे गाय के साथ एक लड़की बैठी हुई दिखाई दी। श्यामा ने उसे सुबह की पहली चाय पिलाई। फिर खुद पी। अब वह उससे बात करने लगी। उस लड़की का नाम कविता था। घर में छोटे भाई बहन और माता पिता भी थे। पर उसे ही मंदिर के बाहर बैठना पड़ता था। उसे कुछ पैसे मिल जाते तो बहुत खुश हो जाती थी। घर की गरीबी ने उसे पढ़ाई छोड़ ने पर मजबूर कर दिया था। श्यामा ने उसे नाश्ता के लिए पूछा तो कविता रोने लगी। कहा छोटे भाई बहन भी घर में है वो अकेली नहीं खा सकती हैं। श्यामा ने उन सभी के लिए नाश्ता दे दिया। घर आकर श्यामा अपने कामों में सब कुछ भूल गई। घर में रिश्तेदारों का आना जाना लगा रहा।बहुत दिनों तक  वो सुबह घूमने नहीं जा पाई। थोड़े दिन बाद देखा अब कविता नहीं आती थी कोई और ही बूढ़ी औरत दिखाई देती। उसने कविता के बारे में पूछा तो ।कुछ नही बोली। फिर श्यामा ने उसका पीछा किया तो पता चला कि कविता और उसका परिवार गांव चला गया था।अब श्यामा बूढ़ी औरत को ही चाय पिलाती कभी कुछ खिला भी देती। उसे कविता की बड़ी याद आती। थोड़े दिन गुजर गए। श्यामा अब बीमार रहने लगी। घर में सभी लोग उसका ख्याल रखते। एक उसे घर के सामने के बगीचे में कविता नज़र आ गई। कविता ने घर की जिम्मेदारी को संभालने के लिए किसी के घर में पूरा काम करना शुरू कर दिया था। श्यामा ने उसे समझाया किचाहे तो वो पढ़ाई पूरी कर सकती है पर कविता नहीं मानी। मजबूरी ने कविता को बचपन में ही घर कीजिम्मेदारी दे दी थी। कई ऐसे बच्चे होते हैं। वो जीवन में बचपन खो देते है और समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं। श्यामा कविता की कुछ मदद नहीं कर पाई उसे हमेशा दुःख होता रहा। वो अब घूमने जाती मगर कविता से नहीं मिल पाती थी। पर एक दिन श्यामा ने कविता को देखा की वो सुबह से शाम तक सारी घर की जिम्मेदारी में अपने को ढाल चुकी थी। उसमें ही उसने सुकून पा लिया था।

-जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सीरिन, ठाणे, वेस्ट मुंबई (महाराष्ट्र)

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