राजनीतिक

महान ऐतिहासिक विरासत और वर्तमान चुनौतियों का बंगाल – विवेक रंजन श्रीवास्तव 

neerajtimes.com -बंगाल में ही जन्मे स्वामी विवेकानंद ने ‘शिकागो व्याख्यान’ के जरिए विश्व को भारतीय दर्शन से जोड़ा था , आज उसी बंगाल में वैचारिक असहिष्णुता का बढ़ना चिंताजनक है। बंगाल का ‘आत्मविश्वास’ कब और क्यों राजनीतिक भय में परिवर्तित हुआ और उससे निकलने के बौद्धिक, वैचारिक समृद्धि के रास्ते क्या हैं? शांति से चुनाव के बाद भी हत्याओं का सिलसिला बेहद चिंता कारक है। ‘जन-गण-मन’ के रचयिता ने जिस उन्मुक्त आकाश और भयमुक्त मस्तिष्क की कल्पना की थी, वह आज संकीर्ण राजनीतिक ध्रुवीकरण की भेंट है।
आजाद हिंद फौज का अनुशासन और सर्वधर्म समभाव बंगाल की पहचान थी। वर्तमान की ‘अपराध केंद्रित सत्ता वाली राजनीति’ नेताजी के उन उच्च आदर्शों के सर्वथा विपरीत है।
विज्ञान में नोबेल दिलाने वाली यह धरती तार्किकता का केंद्र थी, किंतु आज यहाँ तर्क का स्थान कुतर्क और हिंसा ने ले लिया । चुनाव और सत्ता संघर्ष के दौरान होने वाली वीभत्स घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या यह वही ‘भद्रलोक’ समाज है?
‘ममता रिजीम’ पर लगने वाले 50 साल पीछे धकेलने के आरोप केवल आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की ओर इशारा करते हैं। बंगाल का संकट केवल एक राज्य का नहीं है,यह पिछले समय में पूरे देश की सोच में ‘असहमति के प्रति बढ़ती हिंसा’ का प्रतिबिंब है। वह राज्य जिसने नोबेल विजेता और वैश्विक विचारक दिए,वह राज्य जो आज अपराध, सिंडिकेट राज और घटिया राजनीति के लिए चर्चा में है, देखकर मन व्यथित होता है।
बंगाल को किसी नए राजनीतिक वाद की नहीं, बल्कि अपने ही ‘स्वर्णिम अतीत’ को वर्तमान में उतारने की आवश्यकता है। बंगाल को फिर से संवाद, कला , फिल्म और फुटबॉल की प्रगतिवादी सोच समझ से बनाना होगा।
प्राथमिकता ‘विकास और सुरक्षा’ होनी चाहिए, न कि ‘विनाश और प्रतिशोध’। यदि बंगाल की ‘आब-ओ-हवा’ में फिर से वही बौद्धिक गहराई लानी है, तो उसे अपनी ‘सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मेधा’ को पहचानना होगा।
बंगाल ने आजादी के आंदोलन को नेतृत्व और दिशा दी थी,कलकत्ता में सबसे पहले बिजली जगमगाई थी,यहां की माटी में वह ताकत है,जिस पर आज भी भारत गर्व कर सकता है। शर्त बस इतनी सी है कि बंगाली मानुष अपने अतीत,अपने साहित्य औरअपने महापुरुषों के पदचिह्नों को न भूले। (विभूति फीचर्स)

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