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धोखे का चेहरा – अविनाश श्रीवास्तव

चेहरे पर मुस्कान लिए, दिल में ज़हर छुपाए थे,
हम उनको अपना समझे, वो खेल नए रचाए थे।
बातों में मीठास बहुत थी, इरादे मगर काले थे,
हम दीपक बन जलते रहे, वो आँधी बन डाले थे।
हर वादा कागज़ निकला, हर रिश्ता धुआँ हो गया,
जिसको पूजा दिल से हमने, वही सबसे जुदा हो गया।
आँखों में सपने देकर, नींदें सारी ले भागे,
हम सच समझे जिसको अब तक, वो झूठों के थे धागे।
मतलब तक साथ निभाया, फिर राह नई चुन डाली,
हम दर्द लिए बैठे रहे, उसने महफ़िल संभाली।
अब नाम नहीं लेते उनका, बस सीख यही पाई है,
जो दिल से खेला करता है, किस्मत भी ठुकराई है।

  • अविनाश श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश साहित्य, महाराज,गंज,

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