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ज़िंदगी – रुचि मित्तल

मेरे पास किसी दर्पण की तरह नहीं आती
वो तो खिड़की पर बैठे कबूतर सी
हर सुबह मेरी उंगलियों से फिसल जाती है।
मैं उसे पकड़ने नहीं निकलती
बस उसके पाँवों की धूल
अपनी हथेलियों पर जमा कर लेती हूँ।
कभी चूड़ियों की खनक में छिप जाती है
कभी किसी चाय की प्याली में
भाप बनकर उड़ती रहती है।
मेरी ज़िंदगी…
काग़ज़ के उन पन्नों जैसी है
जिन्हें मैं बार-बार मोड़ती हूँ
कभी ख़त बन जाती है,
कभी नाव
कभी महज़ एक शिकन,
जिसे कोई पढ़ नहीं पाता।
मैंने सीख लिया है
ज़िंदगी का नाम मत लेना
वो.ख़फ़ा हो जाती है
बस हल्के से पुकारो
तो पलटकर मुस्कुराती है
और मेरी देह पर
कहीं एक छोटी सी कहानी रख जाती है।
©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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