मनोरंजन

मजदूर दिवस पर – डॉ क्षमा कौशिक

ओ सर्जक!
कहाँ हो तुम…?
खेतों में खलिहानों में
बोझ उठाते,
प्लेटफार्म, गोदामों में,
पत्थर कूटते, गर्मी सहते
पर्वत या मैदानों में,
कहाँ हो…?

दौड़ती सड़कों, पुलों पर
अट्टालिकाओं की नींव या
कंगूरों पर,
जल स्रोतों का रुख बदलते,
वेग रोकते,बाँध की ऊँचाई में,
या जल खोजते
कूपों की गहराई में
कहाँ हो….?

ढूँढ रही हूँ अक्स तुम्हारा,
कोई निशान, जो गवाही दे,
हाँ तुम्हीं तो थे….
तुम्हारी ही स्वेद धाराएँ बही थी यहाँ-वहाँ
अध-पेट हथौड़े चलाये थे,
यहीं कहीं नंगी जमीं पर पाँव फैलाये
तुम पड़े थे…अपने श्रम को निहारते,
खुद पर इतराते..
हाँ….कोई नाम खुदा है
नेम प्लेट पर…..
कोई अभिलेख लिखा है
बाँध पर, इमारत पर,
पर कहीं तुम्हारा जिक्र नहीं
कोई निशान नहीं,
ओ सर्जक!
कहाँ हो?
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड

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