मनोरंजन

मनुष्य की व्यथा – अविनाश श्रीवास्तव

मनुष्य हूँ मैं…

मुस्कान ओढ़े फिरता हूँ,

भीतर कितने तूफ़ान हैं,

ये किससे कहता हूँ?

भीड़ में रहकर भी अक्सर

खुद को तन्हा पाता हूँ,

हँसी के पीछे छुपे दर्द को

हर दिन मैं सजाता हूँ।

रिश्तों की इस दुनिया में

अपनापन कहीं खो गया,

जिसे अपना समझा था

वो भी पराया हो गया।

ख्वाहिशों के बोझ तले

सपनों का दम घुट जाता है,

हर कोशिश के बाद भी

मन क्यों खाली रह जाता है?

कभी खुद से ही लड़ता हूँ,

कभी हालात से हार जाता हूँ,

जीने की इस दौड़ में

कई बार खुद को ही खो जाता हूँ।

पर फिर भी ये दिल कहता है—

रुकना नहीं, चलना है,

अंधेरों के बाद ही तो

एक नया सवेरा मिलना है।

– अविनाश श्रीवास्तव

महराजगंज, उत्तर प्रदेश

Related posts

कविता (अमर जवान) – जसवीर सिंह “हलधर”

newsadmin

श्रीरामलला – सुनील गुप्ता

newsadmin

व्यक्तित्व – हंसदेव बाँधड़े

newsadmin

Leave a Comment