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स्त्रियाँ – सविता सिंह

सिद्धार्थ को गौतम बनाती

स्त्रियाँ अधिक हैं,

मृत प्राणों को फिर से लाती

स्त्रियाँ अधिक हैं।

तीज और करवाचौथ निभाती

स्त्रियाँ अधिक हैं,

सबकी राह नयन बिछाती

स्त्रियाँ अधिक हैं।

सबको देतीं स्नेहिल आशीष

स्त्रियाँ अधिक हैं,

सूने घर को स्वर्ग बनाती

स्त्रियाँ अधिक हैं।

पर खुद गौतम बन न पाती,

कोई सत्यवान सावित्री नहीं बना,

न कोई लक्ष्मण उर्मिला बना।

मायका भी है, ससुराल भी है,

पर अपना एक कोना घर का नहीं होता।

स्त्री तो स्वयं धरा है,

धैर्य, करुणा, जीवन की धारा है।

उसे कहाँ आवश्यकता भला

कि कोई उसके लिए

व्रत रखे या रोज़ा करे।

स्त्री तो आधार शिला सृष्टि की,

उसे दिवस नहीं,जरूरत हैं

बदलती भावनात्मक दृष्टि की।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

 

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