मनोरंजन

जग डराता है – अनिरुद्ध कुमार

राह कोई कहाँ बताता है,

फर्ज देखों सदा जताता है।

*

झेलता आदमी परेशानी,

मतलबी खेल रंग लाता है।

*

कौन बोलें कहाँ उबारा है,

बेवजह रात-दिन सताता है।

*

लोग बेचैन ढूंढते मंजिल,

देख माहौल दिल जलाता है।

*

धूप या छाँव में भटकते सब,

ना कहीं राह नजर आता है।

*

कौन सोंचे किसे फिकर इतनी,

सब यहाँ जाल में फँसाता है।

*

बेकदर ‘अनि’ भटक रहा यारों,

गजब माहौल जग डराता है।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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