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सोचती हूँ – रश्मि मृदुलिका

 

सोचती हूँ कुछ लिखूँ पर हालात साथ नहीं देते,

शब्द जेहन में हैं पर, जज्बात साथ नहीं  देते।

भाव रूठे  हैं  मेरे, थोड़े  थमे हैं, कब तलक?

ये बात है कुछ और कि ख़्यालात साथ नहीं देते।

आती  हैं  काम  दुआऐं ही, अकेले  रहगुज़र में,

खुदगर्जी में  जो दिए, आघात  साथ नहीं देते।

एक बुझते चिराग से भी, मिल जाता हौसला है,

सितारों से उजली सी  वो रात साथ नहीं देते।

जमीं पर ही जुड़के कोई, गर साथ दें तो जाने,

उछली जो आसमां तक, बात साथ नहीं देते।

रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखंड

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