मनोरंजन

सुन रही पदचाप मैं – नीलांजना गुप्ता

सुन रही पदचाप मैं भी घोर कलयुग आ रहा है,

इक निहत्था सन्त यूँ निर्दोष मारा जा रहा है।

 

प्रजा-रक्षक भी वहीं पर हाथ बाँधे यूँ खड़े हैं,

क्रूर शासक के मुकुट ज्यों कीमती हीरे जड़े हैं।

घोर तम छाया है सूरज को निगलता जा रहा है।

सुन रही पदचाप मैं भी……..

 

राजनीतिक दल सभी औ संगठन खामोश क्यूँ है,

आम जनता के हृदय में धधकता आक्रोश यूँ है,

मैं भी हूँ निःशब्द लेकिन मौन सबकुछ गा रहा है।

सुन रही पदचाप मैं भी……..

-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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