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बीता हुआ क्षण – ज्योत्सना जोशी

दूसरों को मिलकर उनको कितना

जान पाएं हैं यह कहना मुश्किल है

लेकिन उनको मिलने के पश्चात

स्वयं तक कुछ हद तक पहुंचा जा सकता है,

तो कह सकती हूं कि मैंने तुझसे मिलने के

पश्चात खुद को जाना

बीते हुए को बुरा कहने से परहेज़ है

मुझे और बीते हुए को अच्छा कहने की

अकुलाहट भी नहीं।

जैसे हल्की ठंड में गुनगुनी धूप का

एक टुकड़ा देह में पसरते हुए

अपना गहरा ,नर्म थोड़ा सा मगर

सुकून भरा कुछ दे जाता है

वो हर बीता हुआ क्षण भी

झरोखे से झांकती इस आंच के

मानिंद ही है।

– ज्योत्सना जोशी ज्योत, देहरादून

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