मनोरंजन

चुप्पी – रुचि मित्तल

 

चुप्पी की भी एक जुबां होती है,

हर बात बिना कहे बयां होती है।

लब ख़ामोश हों तो क्या गम है,

आँखों से भी तो सदा यहां होती है।

चुप्पी कोई डर नहीं, कमजोरी नहीं,

ये कभी मौन सत्य, कभी मजबूरी नहीं।

कभी ये सुकून का समंदर होती है,

कभी दर्द की पूरी गाथा होती है।

कुछ कह न सके, ये ज़रूरी तो नहीं,

दिल में जो हो, वो अधूरी तो नहीं।

लफ्ज़ों से आगे की बात है ये,

जो हर शोर से अलग, खास है ये।

कभी रिश्तों की लाज बचाती है,

कभी टूटी उम्मीदों को छुपाती है।

कभी ख्वाबों की कसमों में लिपटी हुई

कभी यादों के आँसू बहाती है।

ये चुप्पी बहुत कुछ कहती है

बस सुनने वाला चाहिए…

जो समझ सके अनकहे शब्द

और अनकहे जज़्बात।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

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